पहचान

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पहचान

तू मुसाफिर है और
ये जिंदगी है हमसफर।
तुम्हारी सोच और तुम्हारी परछाईं,
सौदा यही से होता है,
नहीं है दूजा रिहाई।

ऊँचें अरमान और डगमग सी चाल,
खुद पर भरोसा भी है एक साजिश।
उम्मीद रख, दिल साफ़ रख
टूट मत, यू ही नहीं मिलती है ख्वाहिश।

तेरा कर्म, तेरा अभिमान
यही होनी है तेरी पहचान।
क्या फर्क पड़ता है आज हालात कैसा है,
मंजिल पाकर ही करना तुम विश्राम।

डगर लंबी है तो क्या हुआ,
खुद ही लगती है अपनी प्यास।
अगर रुक गए आज तुम
न तलब मिटेगी, न मिलेगा तालाब।

तू मुसाफिर है और
ये जिंदगी है हमसफर।

धन्यवाद!

 

Written by- Anjali Bharati