वादियाँ

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वादियाँ

कितनी हसीन है ये वादियाँ,
जी करता है डूब जाऊँ इसमें,
खो जाऊँ इसमें, बह जाऊँ इसमें।

वो बच्चों की खिलखिलाहट,
पंछियों की ये चहक,
इन आँखों की मासूमियत,
वो किसानों की मेहनत।

ये गेहूँ की खड़ी बालियाँ,
ये धान की झुकी बालियाँ,
ये मक्कों की शानो शौकत
और सरसों की शर्मीली मिजाज।

कितनी हसीन है ये वादियाँ,
जी करता है डूब जाऊँ इसमें,
खो जाऊँ इसमें, बह जाऊँ इसमें।।

यहाँ के भोजन का स्वाद,
यहाँ के लोगों का अपनापन।
तन पर सादगी का साज
और खेतों में सुन्दर फसल का राज़।

मिट्टी की सौंधी सी खुशबू,
पेड़ो की छांव में ठंडक।
साँझ हुई तो गपशप सबकी
और रात हुई तो घनघोर खामोशी।

कितनी हसीन है ये वादियाँ,
जी करता है डूब जाऊँ इसमें,
खो जाऊँ इसमें, बह जाऊँ इसमें।।

धन्यवाद!

 

Written by- Bikram Kumar Mandal

अधूरा – Incomplete life

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कविता : अधूरा

ये पल अक्सर ही अधूरे होते हैं।
सब पूरा होकर भी कुछ छुट जातें हैं।
ये अनदेखी साजिश थमती नहीं है,
ये मुश्किलें कम होती नहीं हैं।

कुछ लम्हा नई चाहत बुनती हूँ,
कुछ लम्हा टूटे ख्वाबों को पिरोती हूँ,
कुछ लम्हा याद करती हूँ उसे जो छुट गया राह में पिछे,
कुछ लम्हा तकदीर से अपने बारे में पूछती हूँ।

किसी दिन मैं थक जाती हूँ,
फिर रात को कोशती हूँ,
दूसरी सुबह नई होश में उठती हूँ,
फिर उसी ज़ंग पर निकल पड़ती हूँ।

अक्सर ही लगता है,
कोई कमी मुझमें ही है।
मैं आज के लिए तैयार होती हूँ,
और कल नई चुनौती मिलती है।

सोचती हूँ मैं कभी कभी,
क्यूँ सब हासिल होता नहीं है?
हर वक़्त कुछ पाने की तलब,
ऐ ज़िंदगी! तू इतना क्या ढूंढती है?

धन्यवाद!

 

Written by- Anjali Bharati