पहचान

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पहचान

तू मुसाफिर है और
ये जिंदगी है हमसफर।
तुम्हारी सोच और तुम्हारी परछाईं,
सौदा यही से होता है,
नहीं है दूजा रिहाई।

ऊँचें अरमान और डगमग सी चाल,
खुद पर भरोसा भी है एक साजिश।
उम्मीद रख, दिल साफ़ रख
टूट मत, यू ही नहीं मिलती है ख्वाहिश।

तेरा कर्म, तेरा अभिमान
यही होनी है तेरी पहचान।
क्या फर्क पड़ता है आज हालात कैसा है,
मंजिल पाकर ही करना तुम विश्राम।

डगर लंबी है तो क्या हुआ,
खुद ही लगती है अपनी प्यास।
अगर रुक गए आज तुम
न तलब मिटेगी, न मिलेगा तालाब।

तू मुसाफिर है और
ये जिंदगी है हमसफर।

धन्यवाद!

 

Written by- Anjali Bharati

वादियाँ

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वादियाँ

कितनी हसीन है ये वादियाँ,
जी करता है डूब जाऊँ इसमें,
खो जाऊँ इसमें, बह जाऊँ इसमें।

वो बच्चों की खिलखिलाहट,
पंछियों की ये चहक,
इन आँखों की मासूमियत,
वो किसानों की मेहनत।

ये गेहूँ की खड़ी बालियाँ,
ये धान की झुकी बालियाँ,
ये मक्कों की शानो शौकत
और सरसों की शर्मीली मिजाज।

कितनी हसीन है ये वादियाँ,
जी करता है डूब जाऊँ इसमें,
खो जाऊँ इसमें, बह जाऊँ इसमें।।

यहाँ के भोजन का स्वाद,
यहाँ के लोगों का अपनापन।
तन पर सादगी का साज
और खेतों में सुन्दर फसल का राज़।

मिट्टी की सौंधी सी खुशबू,
पेड़ो की छांव में ठंडक।
साँझ हुई तो गपशप सबकी
और रात हुई तो घनघोर खामोशी।

कितनी हसीन है ये वादियाँ,
जी करता है डूब जाऊँ इसमें,
खो जाऊँ इसमें, बह जाऊँ इसमें।।

धन्यवाद!

 

Written by- Bikram Kumar Mandal

तुम हो… (Love Shayari)

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तुम हो…

 

यहाँ, अभी
सिर्फ तन्हाई है
और
तुम्हारी याद है।
दर्द का एहसास है,
और
तुम्हारे प्यार का खुमार है।
तुम नहीं हो,
मुझे शिकायत है,
दूर हो, फिर भी तुम हो,
इसलिए मुझे राहत है।
यहाँ, अभी
खामोशी की धुन में
सिर्फ तुम्हारा ही दीदार है।
तुम मेरे हो,
बस यहीं सच नजर आ रहा है।

 

Written by- Anjali Bharati

 

अधूरा – Incomplete life

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कविता : अधूरा

ये पल अक्सर ही अधूरे होते हैं।
सब पूरा होकर भी कुछ छुट जातें हैं।
ये अनदेखी साजिश थमती नहीं है,
ये मुश्किलें कम होती नहीं हैं।

कुछ लम्हा नई चाहत बुनती हूँ,
कुछ लम्हा टूटे ख्वाबों को पिरोती हूँ,
कुछ लम्हा याद करती हूँ उसे जो छुट गया राह में पिछे,
कुछ लम्हा तकदीर से अपने बारे में पूछती हूँ।

किसी दिन मैं थक जाती हूँ,
फिर रात को कोशती हूँ,
दूसरी सुबह नई होश में उठती हूँ,
फिर उसी ज़ंग पर निकल पड़ती हूँ।

अक्सर ही लगता है,
कोई कमी मुझमें ही है।
मैं आज के लिए तैयार होती हूँ,
और कल नई चुनौती मिलती है।

सोचती हूँ मैं कभी कभी,
क्यूँ सब हासिल होता नहीं है?
हर वक़्त कुछ पाने की तलब,
ऐ ज़िंदगी! तू इतना क्या ढूंढती है?

धन्यवाद!

 

Written by- Anjali Bharati