कुदरत- A Poetry On Nature

 

कुदरत

परदे को हटा देखी है नई सुबह
मद्धम सी रौशनी हौले से बिखरी है।
खुशबू फूलों की, मुस्कुराहट इन कलियों की,
गुनगुनाती ये हवा मुझे मुझसे मिला रही है।

उमड़ घुमड़ नाच रही है बदरिया
आसमान से रंग बरस रहा है।
झूम रहा है मेरा मन
पल ये बड़ा हसीन बना है।

जी चाहता है मैं खुद उड़ जाऊं,
संग पंछियों के मैं एक सैर कर आऊं।
रहता हूँ मैं जिस ज़मीन पर,
एक बार उसे ऊपर से देख आऊं।

होने लगती है दिल से बात अक्सर
जब भी होता है ऐसे मौसम का आगाज़,
मैं आँखें बंद कर लेता हूँ इस मदहोश फिज़ा में
जब ये आहटें छू लेती हैं मेरे जज़्बात।

ऐ कुदरत! तू जैसी है
हर सुबह ऐसी ही मिले।
बेख़बर इस जहां में
मुझे तेरा आँचल मिले।।

धन्यवाद

Written by – Anjali Bharati

Video Link – https://youtu.be/oFIm_NZTWs0

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